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अर्द्धचंद्र


कल लुप्त थाआज अर्द्ध हूँकल पुनःपूर्ण हो जाऊँगा

गगनवासी हूँनियतिवश लेकिनइस धरा कोसदैव जगमगाऊँगा।

मं शर्मा (रज़ा)

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