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अंतर्व्यथा


आँसू छिपाना आसां हैहमदर्दी पाना खलता हैहर दूसरा शख्स यहाँरूमाल लिए फिरता है

चेहरे पर जो मुखौटा हैजीवन की अंतर्व्यथा हैअधरों पे गहरी मुस्कानयथार्थ नहीं समझौता है।

मं शर्मा (रज़ा)

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