करीब से कुछ यूँ गुज़रानन्हा सा लम्हा कोईजिस्म में वक्त केएक जुंबिश तक न हुईसोचा न था लम्हों काहिसाब रखता है कोईलगा बीज एक अजन्माधरती में दफ्न रह गया कोई।मं शर्मा (रज़ा)
करीब से कुछ यूँ गुज़रानन्हा सा लम्हा कोईजिस्म में वक्त केएक जुंबिश तक न हुई
सोचा न था लम्हों काहिसाब रखता है कोईलगा बीज एक अजन्माधरती में दफ्न रह गया कोई।
मं शर्मा (रज़ा)