चाहतों की भीड़ मेंसुनसान पड़े नीड़ मेंहर किसी के हिय मेंकोई न कोई पीड़ हैजाने क्या मिला नहींजिसे पाने को अधीर है।मं शर्मा (रज़ा)
चाहतों की भीड़ मेंसुनसान पड़े नीड़ मेंहर किसी के हिय मेंकोई न कोई पीड़ हैजाने क्या मिला नहींजिसे पाने को अधीर है।
मं शर्मा (रज़ा)