Poetry 1 min read 2 reads

अभ्यस्त


कहने को बहुत कुछ हैकहता नहीं हूँभावनाओं से हूँ लबरेज़छलकता नहीं हूँ

दिल में उठ रहे बवंडरदिखता खामोश हूँकलम बोलती है बहुतमैं न सुनने का अभ्यस्त हूँ।

मं शर्मा (रज़ा)

Read more Earn more Learn more