ज़िन्दगी के कुछ पल संकुचित से , सिहरे हुए अभी भी मेरी मुट्ठी में कैद है वो पल जिन्हें लम्हो में तब्दील होना मंज़ूर न था वो पल जिन्हें मुझसे दूर जाना मंज़ूर न था मेरी गीली मुट्ठी में पसीजते हुए पलना चाहते है वो मेरे अपने अन्तर्द्वन्द का हिस्सा बन मुझमे ही पिघलना चाहते है श्याद वक़्त से ज्यादा मुझमे भरोसा है इन्हें या फिर मेरे अपने संकुचन , मेरी अपनी सिरहन मेरे अपने अतिरेक होने के डर में कही उन्हें अपना पड़ाव दिखता है