ज़िन्दा....
मृत्यु दुःख देयी है..
है परंतु एक कठोर सच यह।
कोई बात करना नहीं चाहता इस पर,
होती सारी बातें हैं जीवन पर।
कई लोग पूरी ज़िंदगी जी नहीं पाते
मगर,
तुम, मैं, हम सब
कोई भी नहीं बच पाएँगे,
एक दिन सब, कभी ना कभी, मृत्यु को पाएँगे।
पूछो उसे, जिसने मृत्यु को देखा है,
किसी अपने को साँस छोड़ते देखा है,
कैसे मर जाते हैं सारे सपने,
जब हमेशा को छोड़ जाते हैं हमारे अपने।
वो अकेलेपन से सनी रातें,
वो सन्नाटों में गूँजती उनकी बची-कूची आवाज़ें।
वो बस शून्य में सब विसर्जित हो जाना।
और फिर कभी ना लौट के आने का दर्द।
पूछो उसे, समझो उनसे।
तुम्हारे बिना, नए सुबह को जीना,
रातों को रोना, रह रह के पुराने ख़यालों में खोना।
कैसे सब कुछ ठीक होगा?
कैसे फिर वोही पुराने से दिन लौटेंगे?
एक पल को तो तुम थे..
यहीं मेरे साथ, मेरा हाथ छूते..
एक पल में बस तुम चले गए,
ज़िंदगी को छोड़,
बहुत दूर...
मुझे तुमसे एक बात कहनी है..
जब भी मैं आँखें बंद करता हूँ,
तुम आ जाते हो,
ठीक मेरे सामने, मेरे अंदर तक,
तुम्हारी रोशनी, मेरी आँखों को चौंध देती है,
तुम्हें मैं फिर से पा लेता हूँ, अपने अंदर, अपने समीप
पर तुम्हें फिर से अपने पास रखने की कोशिश में,
आँखें खुल जाती है,
और मिलते हैं बस कुछ आँसू।
ये सिलसिला रोज़ का है,
जब से तुम गए हो...
पर तुम फिर भी हो मेरे साथ..
मेरी ज़िंदगी में..
मैं ज़िंदा हूँ,
शायद,
तुम्हें अपनी यादों में ज़िंदा रखने के लिए?