मेरा मन.... मेरा मन अब सीमित संसार में नहीं रह सकता.. उसे उड़ने के लिए एक विस्तृत व्योम चाइए... एक खुला आसमान... जहाँ का फैलाव असीमित हो, बिलकुल अनंत। नहीं चाहिए मानसिक जड़ता.. वो स्थिल्ता। चाहता है मन बने एक पंछी, खुले गगन में उड़ता... या फिर बन बंजारा.. सरहदों के मायने ख़त्म करता। नए डगर, नए शहर.. अनुभूति करता, अनोखी, अनूठी, नयी, एक दम निराली। सपने देखो, रंग भरो, अब डरो मत, चलो, उठो, उड़ो अब रुको मत...