मज़दूर हैं साहेब
मज़दूर हैं साहेब
काठ सा बदन
बाहर, बाहर ठोस
अंदर भूख और बीमारी
अभाव और लाचारी
हाड़, तोड़ करते हैं मेहनत
छाती हुक से दुःख जाती है
काम के होड़ - जोड़ से
नस - नस लम्हर जाती है
सुबह को शाम करते - करते
टूट - टूट कर बिखर जाते हैं
देह - हाथ तक का पत्ता भूल जाते हैं
इस पर भी हम क्या पाते हैं
नरक सा हीं तो जीवन पाते हैं
सर्वश्व खपा कर
हर मूल चूका कर
कैसा दिन - हीन कथा हमारी
मेहरी सुख कर काँटा हुई जाती
हाड़ - हाड़ का देह बची है
भरी पूरी जवानी उसकी
इस भट्ठी में जल भस्म हुई है
बच्चे अपने भी हैं साहेब
आँखों के तारे हैं साहेब
पर पलते कैसे
जैसे पत्थरों पर बनफूल फूलते हैं
जैसे पेड़ों पर काई झूलते हैं
मजदूर हैं साहेब
### मनीष कुमार


