मार देने से क्या आदमी मर जाता है
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मार देने से क्या आदमी मर जाता है
क्या मैं भी मारा जा सकता हूँ
लेकिन मुझ से पहले जो लोग
झूला दिए गए सूली पर
या तोपों से बांध कर जिनके परखचे उड़ा दिए गए
आज़ादी, समानता और बराबरी के सवाल पर
वे चिड़ियाँ बनकर आज भी उड़ रहे हैं
और आदमखोर हथियारों पर बिट कर रहे हैं
अपने सपनों के ख़ातिर मारे गए लोग
आज किताबों में विचार बन हिलोरे मार रहे हैं
मार देने से क्या मैं मर जाऊँगा
यहीं मिट्टी में मिल जाऊँगा
और कोई बुत बन खड़ा हो जाऊँगा
### मनीष कुमार


