जड़ जमें तो कहाँ कितना

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जड़ जमें तो कहाँ कितना

कहाँ बीज चटका

कहाँ अंकुर फूटा

आँधी - तूफानों में बसर हुआ

दुर्गम, दुरांत राहों में सफ़र हुआ

विस्थापित हो कहाँ पेड़ हुआ

न जड़ है कहीं न जमीं है कहीं

न जुड़ा किसी से न बिछुड़ा किसी से

पराई सी धरती

पराई आसमां

छाओं में भी जलना - जलना

जड़ जमें तो कहाँ कितना


### मनीष कुमार