हम मेहनत करने वाले
मेहनत से हीं सुख पैदा करने वाले
1.
उसके सख्त हाथों से कोमल बनती रोटियाँ
उदर में जातीं तो उदरस्त होता,
कोई चरम सुख
उसके हाड़ - तोड़ मेहनत करने के आदि
अभाव ग्रस्त जिस्म के एक स्पर्श मात्र से
कठोर परिश्रम से पस्त
हमारे शरीर में पैदा हो जाती है अनगिनत रागनियां
हमारे वज्र से शरीर पर
चाँदनी सा सुखद बिखर जाता है उसका हर एक स्पर्श
हम मेहनत करने वाले
मेहनत से हीं सुख पैदा करने वाले
2.
तुम्हारे शरीर को पसीने का स्वाद मालूम नहीं
गर्मी, सर्दी, बरसात
सब को कर लेते हो अनुकूलित अपने हिसाब से
पैर के नीचे की जमीं होती है कितनी सख़्त
और जो तप्ती है किसी भट्ठी की तरह
पर ये तपिश तुम कहाँ जान पाए?
मेहनत का एक पल
और भरभरा कर गिर पड़ेगी तुम्हारी चचरी, ठठरी
तुम्हारे अंदर का पुरुष कर्महीनता से हो चूका है स्खलित
और इन्द्रियाँ सारी हो चुकी हैं निढाल
प्रेम के उद्गार के स्रोत सारे कुंद हो चुके हैं
तुम्हारा जिस्म वासना का खंडहर मात्र बचा है
उस में स्पंदन के लिए चाहिए होता है
तुम्हें कोई कामसूत्र, इत्र, स्वाद, सुगन्धि का व्यसन
तुम्हारा जीवन व्यभिचार का अग्नि कुंड है
इसमें जलना और भस्म होना तुम्हारी नियती है।
### मनीष कुमार


