बालकनी में लगा रहा हूँ घास
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बालकनी में लगा रहा हूँ घास
ताकी बड़ होकर इनका नाड़ उन खेतों से जुड सके
जहाँ रोहन नक्षत्र के आगमन के साथ
बाबूजी हिनहिना कर बैलों को रेंगाते होंगे
पानी, कादो, हेंगा करके
बोए जा रहे, होंगे धान
जल्द हीं लहलहा के उठ खड़े होंगे मोरी वाले धान
कैसे झुंड में जुटेंगे रोपनिहार
लय - ताल में गुनगुनाएंगे असाढ़ - सावन के गान
और गीले खेतों में रोपते जाएंगे धान दर धान
जो पानी के बौछारों के साथ हरित कर देंगी धरा को
घरों में माताएं बनाती होंगी पकवान
रोपनिहार गुड, शरबत से गला तर कर
छक कर उठाएंगे बूँट दाल और भात पर अमरा अचार
घर के बालक - बुतरू के मुँह से टपकता रहेगा लार
वे मचाते रहेंगे कोहराम
घर से खेत, खेत से घर, दम - बेदम
यहाँ बालकनी में नहीं जुटते रोपनिहार
जहाँ बालकनी होते हैं वहाँ खेत नहीं होते
जहाँ खेत होते हैं वहाँ बालकनी नहीं होती
खेतों से जिनके नाड़ कट जाते हैं
वे बालकनी में उगाते हैं घास!!
### मनीष कुमार ़ ़ े


