अपने वाष्प से शहर को आँच देते

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शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक

माकते, फ़िरते, सरपट इंजन सा भागते फ़िरते

क्या गर्मी, क्या सर्दी और बरसात

थकी, हारी सी साइकिल उनकी

हैंडल, पैंडल सब लुँज - पुँज

आधा ऊर्जा चूस लेती उनकी

अपने वाष्प से शहर को आँच देते

और शहर को गुलज़ार रखते

रौनक, चकाचौंध आवाद रखते

क्या दिन, क्या रात ?

खुद बदहवास, बेहाल

पसीने से लथपथ

घिसी पैंट पर घिसा हीं शर्ट

चप्पल में टांके दर टांके

भूख - प्यास से दम - बेदम

आते - जाते रोड साईड

ठेले, टीहे पर खा लेते हैं

गिनकर पैसा जो खाया जा सके

और कुछ जो बचाया जा सके 

छोले, कुलचे 20 के

आलू पराठा एक 10 का

या थाली 25 वाली

खाना ये सिर्फ जिंदा रखता है

अंदर के भट्ठी में ताप बनाए रखता है

हाँ, हाइजीन, पौष्टिक, बैलेंस्ड डाइट

खाए, अघाए समुदाय के चोचले सब

रेज़की गिनकर खाने वाले

स्वाद, अस्वाद का भ्रम क्या पालें  

दो रुपइया जहाँ बच जाए

रोटी चाहे कच्ची या बासी

पी लेते हैं पानी वहीं कहीं

टोटी से भर अंजुरी पसार

टाट में पैबंद सा,

शहर के किसी खोह में जी लेते हैं। 

 

### मनीष कुमार