गया हूँ उसी पुराने बाट पर

जीवन का हाट - घाट छोड कर

 

यहाँ से अलायदा कोई मुक़ाम नहीं

बीते तमाम वर्षों में

यही गूढ ज्ञान सिखाते आया था अपने आप को

पैरों में थीं जंजीरे कई

 

लेकिन गिरती दीवारों ने

अलसाई चूल्हों ने

ताखों पर दिए की राख ने

कुछ सुर ऐसा छेड़ा

आवाज कुछ ऐसी लगाई

कि बियावान में फुट आए रास्ते


अब तक कलेजे को मरोरे था बैठा

मन को भी मारे, साधे था बैठा

भिनसहरे - भिनसहरे निकल चला आया 

फाटक, दरवाज़े सब खुला पाया 

इन्हें मेरे आने की ख़ब कैसे आया

 

गर्भ से बाहर गर्म लोथरा भर था मांस का

यहीं एक कमरे में नार कटा

यहीं एक औरत माँ हुई थी

जिसने प्रेम, दुलार से सींचा कुछ ऐसा

कि अंखफोड़ हुआ

हाथ, पैर आए निकल

पैरों में गति

और मन ने विस्तार पाया  

 

बार - बार गिरता

कोहनी, घुटने, फूटते बार - बार

रक्त का पारावार चलता

सब जुटते जीव, सजीव

चारो दिशाओं से टूट कर

दवाओं से ज्यादा दुलार काम कर जाता

नेह का स्पर्श बार - बार सारे घाव भर जाता

 

इस घर में किस से क्या रिश्ता, क्या पूछिए ?

देह - हाथ से सजीव तो छोड़िए

कादो - कीचर के घरौंदों से भी नेह सूत्र जुड़ा है

उधर पूरब में जो सारे तस्वीर टंगे हैं

उन्हीं की दुआओं की बरक़त हैं हम

हल्की सी इधर हरारत जो होती

उधर उन बूढ़े आँखों में नींद नहीं उतरती

मेरे सिराहने हीं कट जाती कई दिन, कई रातें

वक़्त के साथ सब छू-मंतर हो गए

पनडुब्बी जहाज लेकर जाने किधर निकल गए

जिनके हाथों से हाथों में रहती थी गर्मी

पुरवारी तरफ फोटो में कैसे नज़र आते अब

 

उधर आँगन में जो झाड़ियाँ पसर आई है

इनके बीज लगाए थे मैंने हीं कभी

अँजुरी भर प्यार के अभाव में कैसे बेतरतीब बढ आए हैं

उन दिनों जब नहीं मुँह तकना पड़ता था इनको प्यार का

क्या बेझिझक - बेतहासा फूल लुटाते थे प्यार का

आस - पड़ोस तक में कोहबर सजता था इनके इकवाल से

 

अब जब मैं लौट आया हूँ

साथ में अँजुरी भर प्यार लाया हूँ

सारे दरों - दीवारों, सिलवटों पर नेह लेप दूँगा

पक्षियों को दाने

और उजाले को नेह निमंत्रण दूँगा

साँझ भरते हीं

दिवा का प्रकाश दूँगा

देखते हीं देखते जुगनुओं का साहचर्य होगा

कुछ खो कर कुछ पाने का एहसास

इंद्रधनुषीय मुस्कान घर की दीवारों पर होगा

जाने कितने वर्षों बाद सारे कोने - कोठी

गरमा कर सोयेंगे आज। 


### मनीष कुमार