कि वो कोठी ज़लालत की न हमको रास आएगी जहाँ उर्दू की बेचैनी से हिंदी सुगबुगाएगी हमें उन झोंपड़ों में भी सुकून-ए-ताज मिलता है जहाँ हिंदी के कपड़े को कोई उर्दू से सिलता है जहाँ हिंदी अंधेरों में शमा उर्दू जलाती है जखम उर्दू को हो जाए दवा हिंदी लगाती है सियासत ने ख़लल डाला यही सरहद बनाती है वतन की हैं ज़ुबां दोनों मोहब्बत ही सिखाती हैं