अक्सर
लिख कर ग़म को छुपा लेता हूँ अक्सर, कौन हूँ मैं दिखता अपनी कहानियों में अक्सर, ज़िन्दगी को
समझ कर समझाने की भूल भी कर लेता हूँ यूं तो, पर समझकर नासमझी की चादरें ओढ़ भी लेता
हूँ मैं अक्सर।।।
खावों की बहुत सी क्यारिया बुनता हूँ, दिन के सपने और साँझ की हक़ीकत ढलते देखता हूँ अक्सर,
बजूद के आईने में उतरने की कोशिश भी करता हूँ यूं तो, उलझता सुलझता और सुलझकर खुदसे
उलझता भी हूँ मैं अक्सर।।।
उस पेड़ की छाव में कल्पना का आशियाँ बुनता हूँ अक्सर, जहाँ ज़मीन के हक़ किसी और के नाम
लिख जाता हूँ, हक़ के लिए लड़ता, सिपाही सा उभारता भी हूँ मैं अक्सर,
सपनो के अतरंगे रंगो और दुनिया की चकाचोंध के फ़र्क़ के धागे में उलझ जाता हूँ अक्सर, मैंने क्या
कमा लिया और क्या कमाना बाकी और जो कमा लिया वो कितना काफी, इस सवाल पर भी ठहर
जाता हूँ मैं अक्सर।।।
मंज़िल का साथी कौन कौन हैं, उन हाथो के निशान देखना चाहता हूँ, जो छूट गया उस पल को
आज सा बनकर जी लूँ, इस ब्यंग में खो भी जाता हूँ मैं अक्सर, मैं कौन हूँ वो जो समझे नहीं, तोह
क्या समझ आऊं मैं उन्हें, इस मलाल को लेकर जीता भी हूँ अक्सर।।।
अब जो जिया तो इस अक्सर में न उलझूंगा, यही सोचता हूँ मैं अक्सर।।।।
मनीषा राठौर


