मन जब हारे
तन भी तब साथ ना दे
बोझ के मारे दबे कांधे
कितना दर्द सहते हैं
उमडती है भिड़ भी
सैलाब भी मेरे मरने पर
पर जब तक मैं जी रहा
तब तक किसी ने पूछा तक नहीं
क्यू उमर से पहले बूढ़े दिखते हो
ये जो दो रोटी का चक्र है
ये फिरता है बाजारो में
बिकता है दुकानो पे
खोजो तुम सांस कहाँ मिलती है
शायद दफन करने के बाद में
ये जिंदगी नहीं परीक्षा है
और हम सब प्रतिभागी
इसलिए तुम हार ना मानो
उठो खड़े हो कर कहो
फिर से जिएंगे
और दो घुट जिदंगी के हसं कर पियेंगे।

