सत्संग क्या है सत्संग दो शब्दों से बना है सत और संग जिसका स्वाभाविक मतलब है अच्छे लोगों का साथ या आत्मा का साथ। हम जहां रात दिन लोगों की चिंता करते हैं, मनन में लगे रहते हैं, दूसरों में बुराई ढूंढते रहते हैं। कभी हम अपने अंदर की आत्मा से पूछे क्या वो ऐसी . वो बिलकुल ऐसी नहीं है। जब आप किसी सत्संग में जाते हैं तो शायद कुछ देर मन शांत होता होगा। लेकिन शरीर इतने कर्म कांड में फंसा है। तो वो भी व्यथित है। सत्संग का दूसरा मतलब ख़ुशी से भी अगर आप अपनी ज़िंदगी में खुश हों। तो आप दूसरे को भी ख़ुशी दे पाओगे। मन जिस तरह का सोचता है तो आप वही पाओगे। वही जो हमारे अंदर है। हम बहार की दुनिया को भी वही देंगे। इसका सीधा जुड़ाव शिक्षा से भी है। अगर आप ज्यादा शिक्षित होते हैं तो आपको सबका ज्ञान भी होता है। तो आपको शिक्षा देने की जगह ज्यादा सीखनी होगी। ओर हम हमेशा जिज्ञासु बने रहते हैं। आजकल होता क्या है। लोग थोड़ा ज्ञान पाकर समझते हैं हम तो अब ज्ञानी हो गए हैं अब हम सबको सत्संग दे सकते हैं या खुद को शायद भगवान मान लेते हैं। ओर जो भी कहे वो सत्य है उसके अलवा सब झूठ। तरह तरह के अंधविश्वास फलाए जाते हैं ये करलो तो वैसा होगा ये करलो तो वैसा होगा। आज लोगो के पास इस मौजुदा समय में इतनी परेशानिया ,बिमारी है। के वो भी तलाशते है कोई हमें जादू की छड़ी मिल जाए।ओर सब ठीक हो जाये। कहने का तात्पर्य यह है किसी के खिलाफ़ ब्रह्म ना फलाए। लोगो को जगारुक बनाए। खुद को डॉक्टर न बनाए देश में सबका इलाज है। गुरु है तो ज्ञानी बनाओ जागरुकता फलाओ अंधविश्वास नहीं। धन्यवाद?

