चाँद क्या कभी मिला तुम्हें तनहा
तारे सब साथ मगर वो खड़ा रहा तनहा
बुझ गयी हर तरफ़ की आग
उड़ता रहता है पर वो धुआँ तनहा
ना जाने कितने चेहरों से घिरा रहता है
दिल मिला मगर हर जगह तनहा
ज़िंदगी जीना क्या इसे भी कहते हैं
एक बिस्तर पे रहें दो जहाँ तनहा
हम तुम चले साथ पर
मंज़िलें जुदा रहीं सफ़र तनहा
झिलमिलाती हुई शाम तनहा
शेर तनहा और ग़ज़ल तनहा


