साड़ी क्यूँ नहीं पहनती हो तुम
पहना करो ना
अच्छी लगती हो
जब ज़माने भर के रंग
जो तनहा पड़े हैं
पल्लू से अपने समेट लेती हो
अच्छी लगती हो
जब बिखरे काले बालों में
अपने माथे पे
काली बिंदी सजाती हो
अच्छी लगती हो
जब कमर पे पहन कमरबंद
बाँध लेती हो पूरी दुनिया को
अपनी नाफ़ पे
अच्छी लगती हो
जब चाँदी की चूड़ियाँ
भर लेती हो अपने हाथों में
रफ़्तार बढ़ती हो दिलों की
अच्छी लगती हो
जब यूँ ही झटक देती हो
अपनी ज़ुल्फ़ों से
पानी की बूदों को
तपते ज़ेठ की बारिश लगती हो


