वक्त हाथों से फिसलकर दूर यूं गिरने लगा

अपार आशाओं का मौसम फिर से यूं खिलने लगा

कुछ अजनबी इच्छाएं मन में खिल चुकी खिलने लगी

बहती हुई धारा नदी की सिंधु में मिलने लगी

हर दिन नई उम्मीद का जल बूंद कर बढ़ने लगा

करने को पूरा ख्वाब ये मन खुद मचलने है लगा

माप दी है कुछ जमीं पर दिल अभी न है भरा

माप कर सारी जमीं अब मापना है आसमां