मर्द ढाई अक्षरों का सबसे वजनदार शब्द ,
इतना वजन की इसके नीचे कितने दबते चले गए,
फिल्मो ने कभी विलन तो कभी हीरो बनाया ,
जिसने जैसा चाहा वैसा समझाया ,
किसी ने कहा कि मर्द को दर्द कैसा ,
तो किसी ने कहा मर्द कभी रोते नही ,
क्यों ऐसा है कि लाख दर्द में हो चीख नही सकते,
दिल फ़ट भी जाये पर रो नही सकते ,
इस झुठ की दलदल में धसते चले जाते है ,
बिचारे आधी जिंदगी नीद की गोलियां खाते है ,
जिम्मेदारी के नीचे यू दब चुके है,
की 12 साल में ही कुछ मर्द हो चुके है ,
अगली बार उनकी आंखें नम देखना तो कोई राय मत बना लेना,
हो सके तो उनका हाथ पकड़ के उनका हाल पूछ लेंना ,
यू तो वो अपने दर्द को बोल नही पाते,
दर्द तो दर्द वो प्यार तक जता नहीं पाते ,
किस्मत उसकी अच्छी रही तो एक मर्द को रोना आएगा ,
पर उस दिन बिचारा वो बिना गोलीयों के सो जाएगा ।


