यूं तो रोज ही चाहत होती उनसे बात करने की,
पर ये चाहत कब आरजू बन गई, पता ही ना चला
हम रोज ही शब्दो के ऊन से स्वेटर बूना करते है,
एक सलाई हम तोह एक पल्ला वो बुना करते है,
ये शब्द कब अलफाज हो गए पता ही ना चला।
वैसे तो हम रोज ही उनके अवाजो कि खनक सुना करते है,
लेकिन, आज वो खनक नहीं सुनी तोह कुछ बिसरा सा लगा,
कब ये खनक संगीत बन गई पता ही ना चला।
हम तो प्रेम की सागर में किनारे पे ही कदम संभाल चलते है,
कहीं ये लहरे हमे डगमगा ना दे , कदम दबा के चलते है,
ये लहरे कब शैलाब बनाकर बहा ले गई मुझे पता ही ना चला।
हमे लगा हम तैर के निकल जाएंगे, बहके कदम संभल जाएंगे, सो
दुआ में तोह मैंने रिहाई मांगी इन प्रेम की लहरों से, मेरी जुबां कब उन्हें पाने कि दुआ की पता ही ना चला।


