डर..
पता नहीं, क्यो डरा सा रहता था,
कुछ था भी तो नही, पर ना जाने क्यो कुछ खोने से डरा रहता था।
कैसी ये जद्दजहद थी मेरी, कि कुछ छूट ना जाय,
कोइ था भी तो नहीं, फिर क्यों अपनी ही कलाई इतनी जोर से पकड़ा रहता था।
आज देखा अतीत के कुछ पन्ने, कुछ कहानी भी तो नहीं थी,
फिर भी न जाने कौन सी कहानी लिखा करता था।
आज न जाने इतना फिर से क्यों डर सा गया था, कुछ था जिसमे जकड़ सा गया था,
और देखा एक आशा की किरण, फिर सोचा , ये आंखे बंद कर के खुद से ही क्यो लड़ रहा था।
:YourMan
