प्रत्यंचा



कभी नंदलाल गोपाल बने,

कभी पुरुषोत्तम श्रीराम बने ।

कभी अंगराज,कभी पार्थ बने ,

कभी ब्राह्मण परशुराम बने ।।

कभी धीर धरे ,कभी वार करे ,

कभी बन सिंह संघार करें ।।


निकाल तीर तूणीर से ,

बाण-धनुष संधान किया ।

खींच प्रत्यंचा कर्ण तक,

लक्ष्य मेघ में साध दिया ।।

तरणि के तेज सा,

तीव्र तीर नभ चीर गया ।

हाहाकार मचता गया,

जहां जहां तक तीर गया ।।


करे रण की कभी घोषणा ,

कभी शांति दूत बन जाता है ।

कभी वक्ष पार कर जाए तीर,

कभी शीश उड़ा ले आता है ।।

कभी बरसाए शीतल जल,

कभी अग्नि बरसाता है ।

कर विनाश दुष्टों का फिर ,

धर्म-ध्वज लहराता है ।।


कर समाप्त एक तीर में रण को ,

न रूकता , न इठलाता है ।

करे समर्पित प्राण समर में,

कभी अनल बन जाता है ।

तब जाकर कोई धनुर्धर ,

एक योद्धा कहलाता है ।।

एक योद्धा कहलाता है ।।



✍️ *मनीष झा*