ढूँढती हैं, दो आँखें.... कभी खिड़कियों से, कभी दरवाजों से, तो कभी छत के मुँडेर पर से, गुजरने वाले हर राहगीर में अपना ग्राहक.... मजबूर हैं ये, देह बेच कर, पेट की भूख मिटाने के लिए..... बदल चुकी है, अब इनकी पहचान, कोई नहीं पुकारता इन्हें, इनके नाम से.... औरत शब्द सुने, इनके कानों को, ना जाने कितनी सदियाँ बीत चुकी हैं, भूला चुकी हैं, ये अपने नाम तक को, अब इनकी पहचान है, या तो कोठा नंबर से, या फिर, वैश्या से...... जो हर रात, अपने देह का माँस नोचकर, खिलाती है, कुछ इंसानी जानवरों को, और शांत करती है, उनके हवस की भूख...