वर्षों शान से खड़ा एक पुराना मकान आज ढह गया...
स्तम्भ उसके जर्जर हो गए थे
सीलन और दरार उसके दीवारों में आ गयी थी
सीमेंट की परतें भी दीवार का साथ छोड़ चुकी थी
छत का मुंडेर भी झड़ चुका था....
कोई नहीं रहता था अब यहाँ सिवाए कुछ टूटी कुर्सियाँ,
एक दीमक लगी चारपाई और दो-चार पुराने,
धूलमें लिपटे,
टूटे-फूटे एल्युमीनियम बर्तन के...
हाँ,
कुछ गोरैये और कबूतरों ने जरूर अपना घर बना रखा था,
कभी-कभी गुटर-गुँ गुटर-गुँ की आवाज़ आती तो थी पर,
कुछ दिनों से....
ये आवाजें भी आनी बंद हो गयी थी.....
शायद उन्हें भी कोई नया ठिकाना मिल गया था........
अकेलापन अब इसे सहन नहीं था,
पहले जैसी ताकत भी नहीं बची थी
इसमें सड़क के दाहिनी किनारे पर खड़ा यह मकान......
वहाँ से आने जाने वालों लोगों को आशा भरी निगाहों से देखता
जैसे किसी अपने के आने की उम्मीद उसे आज भी हो....
पर,
सुबह आई बारिश,
आँधी और तूफ़ान में वर्षों से अकेला खड़ा यह मकान ढह गया....