
यह सच है.....
कि कुछ कविताएँ होती है,
बड़ी ही नीरस....
उबासी लेती हुई,
अलसायी सी,
रस विहीन.....
जिनमें ना तो छंद होता है,
ना ही अलंकार....
लयविहीन ये कविताएँ,
चुपचाप पड़ी रहती हैं,
किताब के आखिरी पन्ने पर...
या फिर,
कभी- कभी छप जाती है,
अखबार क
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