यह सच है..... कि कुछ कविताएँ होती है, बड़ी ही नीरस.... उबासी लेती हुई, अलसायी सी, रस विहीन..... जिनमें ना तो छंद होता है, ना ही अलंकार.... लयविहीन ये कविताएँ, चुपचाप पड़ी रहती हैं, किताब के आखिरी पन्ने पर... या फिर, कभी- कभी छप जाती है, अखबार के अंतिम पृष्ठ के कोने में.... जिस पर शायद ही, किसी की नजर टिकती हो। पर, नीरस लगने वाली, इन कविताओं में होती है, आम जन के दर्द के साथ कराहते शब्द, और अंतर्मन को झकझोर देने वाली पंक्तियाँ..... जो दर्पण का काम करती है, हमारे समाज के लिए... यह सच है.......