वो समर्पण का अस्तित्व,

मैं बस उसके गीत गाई थीं,

वो कृष्ण की भक्त,

मैं तो तुम्हारी कहलाई थीं,

वो भक्ति में लीन,

दुनिया से सन्यासी थीं,

मैं तो तुम्हारी कहलाई दासी थीं,

उसका मन कृष्ण में,

मेरे मन में तुम बसे थे,

वो उसकी मूर्ति को लेकर,

तो मैं तुम्हारी तस्वीर लेकर नाची थीं,

चरणों में अर्पण दोनों ने,

प्रेम को समर्पण समझा,

पर वो मीरा तो मैं चरित्रहीन कहलाई थीं..!