बाज़ दफ़ा ज़माना मेरी सुख़न-गोई से नाराज़ नज़र आता है गर ना बयाँ करें कुछ तो अपने ख़्यालों का मिज़ाज नासाज़ नज़र आता है अब तो इस बज़्म में हर कोई सैयाद नज़र आता है।