जिन दिनों मैं बच्ची हुआ करती थी
और बचकान सा कुछ लिख लिया करती थी
उन दिनों भी मेरी माँ
मेरी सबसे बड़ी fan हुआ करती थी
मैं डायरी में उल्टा सीधा बेतुका बेमेल लिख
उसे अपनी अलमारी में छुपा दिया करती थी
वो ना जाने कहाँ से उसे ढूँढ
उस पे वाह लिख दिया करती थी
फिर एक दिन मैं उस घर से विदा हो गई
और उनकी बेटी से ख़ुद माँ हो गई
अब वो डायरी उनके पास थी
पर उन्होंने उसे ना फाड़ा ना जलाया
और एक दिन मुझे देते हुए कहा
इसे छपवाती क्यूँ नहीं
मैं बोली माँ इसे कौन पढ़ेगा
वो बोली ये सोचना तुम्हारा काम नहीं
मैं ने उनसे फिर कुछ ना कहा
और डायरी लेकर उसे फिर से छुपा दिया
अब मैं भूल चुकी थी
कि मैं भी कभी लिखा करती थी
पर मेरी माँ ने शायद दुआ बन्द ना की
फिर एक दिन मेरे बच्चों ने वो डायरी ढूँढ ली
डायरी भी कमबख्त चराग़-ए-जिन निकली
उसे देख बच्चों ने भी वो ही कहाँ
जो कभी माँ कहा करती थी
कि माँ तुम फिर से लिखती क्यूँ नहीं
अब मेरे fans की गिनती बढ़ गई थी साहब
वो एक से तीन हो चुकी थे
मुझको ख़ुद पर हो ना हो
पर इन fans को मुझ पे बड़ा यक़ीं था
अब मेरी माँ की दुआओं का असर मुझ पर दिखा
और ये उल्टा सीधा लिखने का कारवां फिर शुरू हुआ
फिर क्या था कलम सरपट दौड़ पड़ी
अब मेरे बच्चों ने मेरी
वो उल्टी सीधी लेखनी को fb पर डाला
इस fb page ने साहब
मेरा हौसला और बढ़ा डाला
अब मेरी माँ और बच्चों के प्यार
और दुआओं का असर दिखने लगा है
और मेरी उल्टी सीधी लेखनी का कारवां
“मेरे ख़्याल” बन कर
किताबी पन्नों पर बिकने लगा है।