इश्क़ फ़िज़ाओं में उन दिनों भी था
पर दुश्मन ज़माना ऐसा ना था
मिलती थी निगाहें उन दिनों भी
पर निगाहों पे इतना पहरा ना था
खिलते थे फूल गुलिस्ताँ में उन दिनों भी
पर सियासत का उन पे चेहरा ना था
धर्म की इस पे ठेकेदारी ना थी
इश्क़ बाज़ारों में यूँ बिकता ना था।।