मेरी ज़ुबां के नुक़्ते बताते हैं
कि मैं हिन्दू हूँ या मुसलमां
तस्बीह फेरू तो नीयत ख़राब है मेरी
जो फेरू माला तो सोच पाक हो जाती है
क्या फ़र्क़ पड़ता है मेरे यार
के मैं अल्लाह कहूँ या राम
गर मैं तेरे काम न आ सका
तो मैं काहे का इन्सान
चाहे फिर मैं हिन्दू हों या मुसलमान
इंसानी ज़ात की सिर्फ़ मोहब्बत ही पहचान ।