रुग्णता आती नहीं है क्षण भर में

नैतिकता पनपती नहीं प्रवचन से


हमें मिट्टी के दीयों को 

अच्छे से पकाना होगा

चाक तो है, लोंदे भी है, 

व्यवस्थित धुरी पे घुमाना होगा


अनुशाषित न होंगे 

जब तक हम

सुविकसित विचार

एक फ़साना होगा



कमियाँ हम में भी,

त्रुटियों उसमें भी है

हम आपको मिलकर 

एक माहौल बनाना होगा

तपेंगे खुद और तपायेंगे उसको

तभी ये स्वस्थ जमाना होगा


कुंदन भी दमकता है

भठ्ठी की तपिश में

ऐसे ही हर शख्श को 

अपना चरित्र बनाना होगा।

- © मणि भूषण 'स्वरचित'