गुज़रती है घड़ी जो फिर नहीं वापिस वो आती है
घड़ी की घूमती सूई सबक़ हमको सिखाती है।
मेरे दिल में है वीरानी ज़बाँ ख़ामोश है मेरी
ये शाय़द रूह है मेरी जो इतना ग़ुल मचाती है।
ये दर्द -ए- हिज्र होता है मुझे तू याद आता है
तेरी यादों को मेरी चश़्म अश्क़ों में बहाती है।
अंधेरा रात में फैला नहीं हमको डराता है
ज़माने की है साज़िश जो वो ही हमको डराती है।
परिंदों के लिए बंदिश नहीं कोई जहाँ में है
ये इंसानों की रंजिश है जो सरहद को बनाती है।
अकड़ता है शजर उसको ये आँधी तोड़ जाती है
वही टहनी तो फलती है जो ख़ुद को फिर झुकाती है।
उगलता आग़ सूरज भी कभी तो डूब जाता है
नदी जितनी भी गहरी हो वो सागर में समाती है।
ये उल्फ़त है ये रातों में जगाती है सताती है
जो मिल जाए बनाती है मिले ना तो मिटाती है।


