दबे दिल के समंदर में कई ग़म थे पुराने से
बहा कर ले गए आँसू इन्हें ग़म के खज़ाने से।
मिरा भी हाल कोई अब सुना दे गर तो अच्छा है
नहीं वाक़िफ़ हूँ अपनी क़ैफ़ियत से इक ज़माने से।
ये तारीकी तिरे इस शहर की अच्छी नहीं लगती
करो रोशन अगर हो तो मिरे घर को जलाने से।
है यादों के चराग़ो से मिरे दिल का जहाँ रोशन
चमकती हैं बुझी आँखें तिरे मेरे फ़साने से।
नहीं मुमकिन दवा इसकी ज़माने में कहीं पर भी
ये दाग़ -ए- आह हैं "राही" नहीं मिटते मिटाने से।


