बरसाती छाते निकलने लगे हैं अब साल भर दुबके थे जो एक कोने में वक़्त की धूल जम गई थी जिनपे धुलने लगे हैं अब हर बार अपने आप हम भी कितने मतलबी होते हैं इनके साथ साल भर नही लगाते इनको हाथ बरसात में इनकी खातिरदारी करते हैं कैसे है ये सुध इनकी लेते हैं नही टिकते ये तेज बारिशों में लेकिन एक भरोसा जरूर दे जाते हैं साथ होने का हस्ते हैं लोग जब किसी की छतरी उटलती हुई देखते हैं खुद के गिरेबान में कभी झाँका है उन्होंने वो कितने उल्टे हुए हैं ये बरसाती छाते फिर दिखने लगे हैं भीड़ में अब हमने बांट लिया है इन्हें भी काले वाले मेरे और रंगीन वाले उसके कहाँ चलते हैं ज़्यादा दिन ये दो बारिशें ही हैं इनकी जिंदगी बिखर जाते हैं फिर धीरे धिरे तिलयों से जैसे एक हारे आशिक़ की जिंदगी बिखरती है बहुत कुछ सीखा जाते हैं ये बरसाती छाते अपनी छोटी सी उमर में