धूप चेहरा जला रही है, परछाई, जूता खा रही है, शरीर पानी फेंक रहा है, एक दरख़्त पास आ रहा है। उसके आंचल में मैं पला हूँ, उसके वात्सल्य की साँस पीकर, आज मैं भी हरा हूँ। आप विश्वास नहीं करेंगें, पर इस जंगल में एक पेड़ ने मुझे सींचा है। मैं इसे माँ कहता हूँ। जब रात शोर खा चुकी होती है। जब हमारी घबराहट, नींद को रात से छोटा कर देती है। जब हमारी कायरता, सपनों में दख़ल देने लगती है। तब माथे पर उसकी उंग्लियाँ हरक़त करती हैं और मैं सो जाता हूँ...।