
जले हुए कागज़ों पर वह अपना नाम ढूंढ़ती थी।
हाथ काले होने के डर से...
फूंक-फूंक कर पूछती थी।
कत्थई बड़े-बड़े फूलों को सुखा देती थी,
पढ़ी हुई किताबों के बीच में छिपा के सोती थी।
रोने की एक छोटी सी जगह पर,
देर तक खड़ा रखती थी।
दूसरों के आईनों में खुद को देखा करती थी।
उन आईनों के सुरक्षित धेरे में मैं नहीं बंध पाया।
बेईमानी की रेत पर ईमानदारी की एक छतरी मैं खोले रहा।
छतरी की छाह..
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