जले हुए कागज़ों पर वह अपना नाम ढूंढ़ती थी।
हाथ काले होने के डर से...
फूंक-फूंक कर पूछती थी।
कत्थई बड़े-बड़े फूलों को सुखा देती थी,
पढ़ी हुई किताबों के बीच में छिपा के सोती थी।
रोने की एक छोटी सी जगह पर,
देर तक खड़ा रखती थी।
दूसरों के आईनों में खुद को देखा करती थी।
उन आईनों के सुरक्षित धेरे में मैं नहीं बंध पाया।
बेईमानी की रेत पर ईमानदारी की एक छतरी मैं खोले रहा।
छतरी की छाह... ओकात की चादर जितनी छोटी थी..
मैं पैर फैलाए अकेले पड़ा रहा।
लोग धूप-छाँव के खेल में...
भीतर-बाहर जलते रहे।
पढ़ी हुई काफ़्का की किताब में...
सूखे कत्थई फूल मैं चुनता रहा।
जले हुए नामों को अकेले में पढ़ता रहा।
दूसरों की नमी को अपने लिखे में महसूस किया।
अपनी छोटी सी चादर पर, बहुत सी पढ़ी हुई किताबें लिए, बहुत देर तक बैठा रहा।
पढ़ी हुई किताबें,
अभी भी...
पढ़ी जाना बाक़ी रहीं।