वह कहती थी इसे बचाकर रखते हैं.... यह हमारी धूप है... जब हम ठिठुर रहे होगें तो यह काम आएगी। फिर यहाँ वहाँ कुछ काँटे भी बीना करती थी.... कहती थी... जब दूसरे गड़ेगें तो इनसे उन्हें निकालूगीं...। कुछ चीज़े छाती से चिपकाकर बुनती रहती थी.... कहती थी... जब हमारे जैसे कोई होगें तो उन्हें पहनाऊगीं। सुबह उठते ही घर जमाती, और शाम को घर सजाना सोचती। सुबह खुश रहती, शाम होते ही चुप हो जाती। कहती थी सपने सच्चे होते है जब सोती थी तो कुछ बुदबुदाती रहती थी। उस बुदबुदाहट के कुछ पात्र थे, आवाज़े थी, हँसी थी। वह दूसरी दुनियाँ थी...। जब तक मैंने उस दुनियाँ को जाना, सुना.. मैं दर्शक हो गया।