बहुत पहले... अब तो मुझे याद भी नहीं कब, मैंने अपने हाथ पर लिख दिया था- 'प्रेम'। क्यों ? क्यों का पता नहीं, पर शायद ये- मेरे भीतर पड़े सूखे कुंए के लिए, बाल्टी खरीदने की आशा जैसा था। सो मैंने इसे अपने हाथ पर लिख दिया-'प्रेम'। आशा? आशा ये कि इसे किसी को दे दूंगा। ज़बरदस्ती नहीं, चोरी से... किसी की जेब में डाल दूंगा, या किसी की किताब में रख दूंगा, या 'रख के भूल गया जैसा'- किसी के पास छोड़ दूंगा। इससे क्या होगा ठीक-ठीक पता नहीं... पर शायद मेरा ये- 'प्रेम' जब उस किसी के साथ रहते-रहते बड़ा हो जाएगा, तब... तब मैं बाल्टी खरीदकर अपने सूखे कुंए के पास जाउंगा, और वहां मुझे पानी पड़ा मिलेगा। पर एसा हुआ नहीं, 'प्रेम' मैं चोरी से किसी को दे नहीं पाया, वो मेरे हाथ में ही गुदा रहा। फिर इसके काफी समय बाद... अब मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कब, मुझे तुम मिली और मैंने, अपने हाथ में लिखे इस शब्द 'प्रेम' को, वाक्य में बदल दिया। "मैं तुमसे 'प्रेम' करता हूँ" और इसे लिए तुम्हारे साथ घूमता रहा। सोचा इसे तुम्हें दे दूंगा। ज़बरदस्ती नहीं.... चोरी से, तुम्हारे बालों में फसा दूंगा, या तुम्हारी गर्दन से लुढ़कती हुई पसीने की बूंद के साथ, बहा दूंगा। या अपने किस्से कहानियाँ कहते हुए, इसे बी़च में डाल दूंगा। फिर जब ये वाक्य, तुम्हारे साथ रहते-रहते बड़ा हो जाएगा, तब मैं अपने कुंए के पानी में, बाल्टी समेत छलांग लगा जाउंगा। पर ऎसा हुआ नहीं, ये वाक्य मैं चोरी से तुम्हें दे नहीं पाया। ये मेरी हथेली में ही गुदा रहा। पर अभी कुछ समय पहले... अभी ठीक-ठीक याद नहीं कब, ये वाक्य अचानक कविता बन गया। 'प्रेम' - "मैं तुमसे 'प्रेम' करता हूँ", और उसकी कविता। भीतर कुंआ वैसा ही सूखा पड़ा था। बाल्टी खरीदने की आशा... अभी तक आशा ही थी। और ये कविता!!! इसे मैं कई दिनों से अपने साथ लिए घूम रहा हूँ। अब सोचता हूँ, कम से कम, इसे ही तुम्हें सुना दूँ। नहीं.. नहीं.. ज़बरदती नहीं, चोरी से... भी नहीं, बस तुम्हारी इच्छा से...।