
बहुत पहले...
अब तो मुझे याद भी नहीं कब,
मैंने अपने हाथ पर लिख दिया था- 'प्रेम'।
क्यों ? क्यों का पता नहीं,
पर शायद ये-
मेरे भीतर पड़े सूखे कुंए के लिए,
बाल्टी खरीदने की आशा जैसा था।
सो मैंने इसे अपने हाथ पर लिख दिया-'प्रेम'।
आशा?
आशा ये कि इसे किसी को दे दूंगा।
ज़बरदस्ती नहीं, चोरी से...
किसी की जेब में डाल दूंगा,
या किसी की किताब में रख दूंगा,
या 'रख के भूल गया जैसा'- किसी के पास छोड़ दूंगा।
इससे क्या होगा ठीक-ठीक पता नहीं...
पर शायद मेरा ये- 'प्रेम'
जब उस किसी के साथ रहते-रहते बड़ा हो जाएगा,
तब...
तब मैं बाल्टी खरीदकर अपने सूखे कुंए के पास जाउंगा,
और वहां मुझे पानी पड़ा मिलेगा।
पर एसा हुआ नहीं,
'प्रेम' मैं चोरी से किसी को दे नहीं पाया,
वो मेरे हाथ में ही गुदा रहा।
फिर इसके काफी समय बाद...
अब मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कब,
मुझे तुम मिली और मैंने,
अपने हाथ में लिखे इस शब्द 'प्रेम' को,
वाक्य में बदल दिया।
"मैं तुमसे 'प्रेम' करता हूँ"
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