Poetry 1 min read 214K reads

दफ़नाने चला है।


देखो, वो अपनी साख बचाने में लगा है,टूटे पत्ते को दरिया में बहाने चला है।

सच से नज़रें चुराकर, असलियत दबाने की ख़ातिर,दिल के उठते शोर को भी दफ़नाने चला है।

— कर्ण
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