कभी नीले आसमां पे मुख्तसर से सितारें हैं,
कभी शिद्दत की गर्मी,कभी बारिश की फुहारें हैं
कभी खिली धूप तो कभी काली घटा के नज़ारे हैं
कभी ख़ुद को परेशां करते अब अपने ही इशारे हैं
क्योंकि ये मुख़्तलिफ़ मौसम,ये जमीं की आरज़ू और
सिलसिला ये मोहब्बत का सब समझ से परे हमारे हैं।
©Manas Upadhyay


