मौत का तांडव चहुँ ओर था
हर तरफ सवालों का शोर था,
और वो ढूंढा किये जवाब तस्सली से ।
छत रह गई ,घर उजड़ गए,
सरपरस्त, नौनिहां बिछड़ गए
वो महलों के सजाते रहे ख्वाब तस्सली से ।
कफ़न तक मुफलिसी की हद पहुँची,
दवा , पहुंची न कहीं रसद पहुंची ,
मर्ज़ को बनने दिया अज़ाब , तस्सली से ।
हर टूटती हुई सांस,
हर बुझती हुई आस,
सबका वक़्त करेगा, हिसाब तस्सली से ।
सभी दबी जबां में बोल रहे,
डर से नहीं मुँह खोल रहे,
बुलंद होगी ये आवाज़ तस्सली से ।
इस बिमार वक़्त की,
नब्ज़ पकड़कर ,
करना होगा ,इलाज तस्सली से ।
ममता पंडित


