कहाँ बचें अब

दुःख, दिलासा, आंसू

कितना व्यक्त कर चुके

कितना अव्यक्त है ....

संवेदना भी थक गई ,

जाने यह कैसा वक्त है ।


काल का यह विकराल रूप देख

भीतर तक हम सिहर चुके हैं

अपनों को खोने की आशंका में

तन्हाई में  बिफर चुके हैं

अंदर से सब टूटे टूटे ,

बाहर से सख्त हैं । 

जाने यह कैसा वक़्त है 


हवा बिकी , ज़मीर बिक गया

गरीब लूट गया

अमीर बिक गया

एक जान की खातिर,

आज कहीं शरीर बिक गया,

कफ़न में हुई दलाली पर,

व्यवस्था की इस बदहाली पर

आंखों में उतरा रक्त है

जाने ये कैसा वक़्त है ।


हम फिर भी नहीं जाग रहे,

जिम्मेदारी से भाग रहे,

किसी के सर मंडे गुनाह,

सब बगले झांक रहे

तंत्र यहां फेल हो गया,

जन फिरता अभिशप्त है ।

जाने यह कैसा वक्त है ।


-ममता पंडित