बुरा ये दौर है सब असलहे इतरा रहे हैं
के उनके डर से ज़िंदा आदमी घबरा रहे हैं
करें उम्मीद किससे तीरगी के ख़ात्मे की
उजाले ख़ुद ही रह-रहकर के ज़ुल्मत ढा रहे हैं
खज़ाना है सभी के पास रंगीं हसरतों का
सुकूँ के चंद सिक्के फिर भी क्यूँ ललचा रहे हैं
सहारा झूठ का लेते हैं जो हर बात पर वो
हमें सच बोलने के फ़ायदे गिनवा रहे हैं
उधर चुपचाप लूटे जा रही सब कुछ सियासत
इधर हम खुल के नग्में इन्क़लाबी गा रहे हैं
यूँ कब तक सिर्फ़ हंगामों से बहलाओगे यारों
के अब बदलो भी सूरत आईने उकता रहे हैं
खड़ी हूँ क़त्ल होने को सरे मक़तल मैं कब से
नहीं अब ज़िन्दगी के फ़लसफ़े रास आ रहे हैं
जफ़ा का शौक अब फ़ैशन सरीखा हो गया है
सभी खुल कर नया अंदाज़ ये अपना रहे हैं
शरीके जुर्म थे सब पर कोई मुजरिम नहीं था
अदालत से ये कैसे फ़ैसले अब आ रहे है
सियासी गिरगिटों की ज़ात है मौक़ापरस्ती
युगों से हर घड़ी ये रंग बदले जा रहे हैं
बड़ा नाज़ुक-सा था इसरार इक तस्वीर भेजो
वो दिन है आज तक हम ज़ुल्फ़ ही सुलझा रहे हैं


