कहीं दवाई नहीं तो कहीं है प्राणवायु की कमी,

फैली है बस चारो ओर वबा और वबा की बातें,


कायम बस अब है दहशत के नज़ारे,

और एंबुलेंस के सायरन की आवाजें।


भरी पड़ी है तमाम अस्पताल और दवाखाने,

मुठ्ठी भर डॉक्टर भी कितनों को जांचे?


रूकती कहां है फिर भी चुनावी रैलियां और धार्मिक मेले,

महामारी हो चाहे पुरजोर में , पर सो रही है सरकारें।


जाएं तो कहां जाए अब इंसान?

दिन छोटे है सुकून के, लंबी बनी ग़म की राते।


हश्र ये है अब उस मोड़ पे हम आ खड़े

की कम पड़ रही है ज़मी,कहां दफनाए लाशे?


मर रहे है जो इंसान लाखो में,

वो भी महज रह गए है आंकड़े।


हां मगर, हो चाहे कितनी भी मुश्किल हालातें,

जब तक है जिंदा हम तुम, बुझने न पाए उम्मीद की मशालें,


चलो किसी की मदद करे,

आओ थोड़ा प्यार बांटे।


-मलय (INSTA : @malay.7)