#चल घर अब रात हो गई है।
सुब्ह अब नहीं होगी रात से बात हो गई है।।
#अब नहीं मिलती पुरज़ोर मुझसे।
क्या किसी औऱ से मुलाकात हो गई है।।
#अभी औऱ उगलने थे राज मुझको।
क्या कहा शराब ख़त्म हो गईं है।।
#नहीं रहे अब राजदारों मे राज।
दोस्ती मे ईमानदारी ख़त्म हो गईं है।।
#छालें है पर रुकते नहीं कदम।
क्या मंजिल नाराज़ हो गईं है।।
#रात मे नींद न दिन मे चैन बेदख़ल।
दिन रात मे, रात दिन मे तब्दिल हो गईं है।।
#करे तेरे लिये ख़्वाब के किवाड़ बन्द।
अब मेरी भी नीयत बदल गईं है।।
#नहीं होगा अब बाढ़ का सैलाब।
आंखों मे अब पानी नहीं सुख गईं है।।
#कोई फायदा नहीं अब इल्तज़ा करने का।
मेरी भी कौन सी अर्जी खुदा तक गईं है।।
#क्यूं इल्ज़ाम दूँ तुझे बेवफ़ाई का।
बर्बादी मेरी ख़ुद की ख़ुद से की गई है।।
#क्या तुम अब भी मुझ मे जिंदा हो।
मग़र रूह तो कब की जिस्म से निकल गईं है।।

