आज भी 'शोले' में

'जय', 'वीरू ' और

'ठाकुर' मिलकर

'गब्बर' को मारने के

तरीके ढूंढ रहे है।

गब्बर को मारना ही

जय और वीरू को

'नायक' का दर्जा देगा।

'ठाकुर का इनाम' अलग से।

एक आवाज आज भी

गूंज रही मेरे कानों में,

'इतना सन्नाटा क्यों है भाई'

जनता भी इस उन्माद में

हर हाल में जय और वीरू

से गब्बर को पीटते देखना

चाहती है।

ठाकुर आज भी

कील वाले जूते पहन

इंतजार में

के गब्बर मेरा शिकार है।

सारे चैनल 'हरि राम नाई'

बने बैठे हैं।

जनता विशुद्ध

मनोरंजन चाहती है

आज भी,

जय और वीरू ही जीते।

हर देश में एक शोले

चल रही है

गब्बर के प्रारब्ध में

जय और वीरू

को नायक बनाना लिखा है।

ठाकुर हमेशा रहेगा किसी

गब्बर के इंतजार में।

जो भी हारेगा

गब्बर कहलायेगा

जितने वाला

जय वीरू और ठाकुर।